ISSN 0976-8645

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सप्तमाङ्के भवतां हार्दं स्वागतम्॥

Issue-7th , Vol-II, Date-15.07.2011, Year- 2, Place- Madhubani, Bihar, India

सप्तमाङ्कस्य मुख्यकार्यकर्त्तारः।

लोकार्पणकर्ता- प्रो० श्रुतिधारी सिंह, राँटी ड्यौढी, मधुबनी, बिहार

·         मुख्यसम्पादक- डा० सदानन्द झा

·         सम्पादन-

o    प्रो० रविशंकर मेनन, (’शिक्षा’ प्रभाग)

o    प्रो०पीयूषकान्त दीक्षित (दर्शनप्रभाग)

o    डा० अभयधारी सिंह (संस्कृति प्रभाग)

o    डा० त्रिलोक झा (संस्कृत प्रभाग)

o    बिपिन कुमार झा (सम्पादन प्रबन्धन)

·         सम्पादन सहायक-

o    डा० स्वरूप शर्मा

o    डा० प्रदीप झा

o    डा० सुमन दीक्षित

o    श्री देवानन्द शुक्ल (लिपि संशोधनप्रभाग)

o    सुश्री आकांक्षा शुक्ला

o    श्री गजेन्द्र ठाकुर (लिपि संशोधनप्रभाग)

o    श्री सुरेश्वर मेहेर

o    श्री कुन्दन कुमार मिश्र

o    श्री रामसेवक झा

  प्रकाशक- बिपिन कुमार झा

INDEX

·         प्रस्फुटम्

o   सम्पादकीयम्- विद्यावाचस्पति डा. सदानन्द झा

o   प्रकाशकीयम्- बिपिन कुमार झा

·         साहित्यानुरागः

o   वैदिक जल-चिकित्सा एवं वर्तमान सन्दर्भ -Dr. Umesh Kumar Singh, Dr. Sudha Singh

o   शब्दस्वरूपविमर्श: - डा. सदानन्द झा

o   Doubt in Nyaya Philosophy-Piyushkant Dixit

o   संस्कृतवाङ्मये पर्यावरणम्- Dr. K. Bharat Bhooshan

o   अर्थदृष्ट्या ’अमरकोष एवं हिन्दी वर्डनेट’ का अन्तर्सम्बन्ध एवं उपादेयता- Bipin Kumar Jha

o   प्राचीनकालिकी गुप्तचरव्यावस्था- डॉ. प्रदीप कुमार झा

o   ’पूर्वत्रासिद्धम्’ विमर्शः- रामसेवक झा

o   श्रीमद्भागवतस्य एकादशस्कन्धीय-तिङन्तपदानां शब्दशास्त्रीयमहत्त्वम्-प्रभाकरत्रिपाठी

o   कालिदासस्य अभिज्ञानशाकुन्तले प्रक्रमभङ्गदोष:-Prasanta Kumar Sethi

o   ज्योतिष शास्त्रे रोगविचारः-  अजय कुमार शर्मा

o   रोगनिदाने ज्योतिषशास्त्रस्य योगदानम्- पवन शर्मा

o   भारत-नेपाल सांस्कृतिक संबन्ध एवं मिथिला- Mukesh Kumar jha

o   ग्रहाणां मानवजीवनोपरि प्रभावः-रमेशः

o   मानसिकयोग्यतायाः स्वरूपं भेदाश्च-विजयकुमारः

o   Status of Women in Hindu Society-Chitresh Soni

o   ज्योतिषशास्त्रस्य प्रत्यक्षत्वम्-सुरेश शर्मा

o   Contribution of Locana in the Dhvani theory-Chitrsh Soni

 

·         शृङ्खला प्रभागः

o   “ वसुधैव   कुटुम्बकम्” ,दीक्षित, डा. सुमन       

o   उन्नततमं तृणम्, Dipesh Katira

o   शिक्षानिर्धरणे ज्योतिषशास्त्रास्य योगदानम- शोध्च्छात्र  पवन शर्मा

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प्रस्फुटम्

सम्पादकीयम्

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विद्यावाचस्पति डा. सदानन्द झा

 

नीहार - हार - घनसार - सुधकराभां

कल्याणदां     कनकचम्पकदामभूषाम्।

उत्तुङ्ग- पीनकुचकुम्भ       मनोहराङ्गीं

वाणीं नमामि मनसा  वचसा विमुक्त्यै।।

अये सुरभारती समाराघन तत्परान्त:करणा विद्वज्जना: सहृदया: पाठका:।

विश्वस्य प्रथमान्तर्जालीय संस्कृतत्रौमासिक जाह्नवी पत्रिकाया: सप्तमाङ्कमिमं सहृदय विदुषां पुरत: समुपस्थापयन् अमन्दमानन्दमनुभवामि। सुरभारत्या जगति प्रचार-प्रसार हेतवे प्रारभ्यमाणाङ्कस्य लोकार्पण परम्परा प्रचलिताऽस्ति। अस्या जाह्नव्या प्रथमाङ्का प्रारभ्यमाणाङ्कं यावत् लोकार्पण-कार्यक्रम विवरणमत्र संक्षेपेण प्रस्तूयते। अस्या: प्रथमाङ्कस्य लोकार्पणं वेङ्कटेशनगर्य्यां तिरुपतिस्थ संस्कृतविश्वविद्यालयीय कुलपतिना प्रो. हरेकृष्ण सतपथिमहाभागेन सोत्साहमापादितम्, द्वितीयाङ्कस्य विश्वनाथपुर्यां हिन्दू विश्वविद्यालयीय कुलसचिवेन पी. के. उपाध्यायमहाशयेन सम्पादितम्, तृतीयाङ्कस्य दरभङ्गा मण्डलान्तर्गत मिथिलामहीमण्डनायमानोद्यान ग्रामे प्रो. रामजीठाकुर महाशयेन व्यध्यायि, चतुर्थाङ्कस्य कार्यक्रमोऽयं संयुक्त राज्यामेरिकास्थिते अटलाण्टानगरे डा. दीनबन्धुचन्दौरामहाभागेन शतशो विदुषामुपस्थितौ सोल्लासं सम्पादित:। अस्या पंचमाङ्कस्य लोकार्पणमह: दिल्लीस्थ श्रीलालबहादुरशास्त्रिाराष्ट्रिय मानित संस्कृत विश्वविद्यालय कुलसचिवेन डा. बी. के. महापात्रामहाभागेन समनुष्ठित:। अपरिहार्यकारणवशात् सर्वस्वदान रसिकानां प्रयागस्थोच्चन्यायालय कार्यवाहक मुख्यन्यायाधिपतिचराणां महामहिम ‘पलोकवसु’ महाशयानामनुपस्थितौ स्वामिवर्याणां निखिलात्मानन्द महाराज महाभागानां करकमलेन प्रयागस्थे स्वाश्रमे प्रो. वनमाली विश्वाल प्रभृतीनामुपस्थितौ सुरम्यवातावरणे अस्या: षष्ठाङ्कस्य लोकार्पणकार्यक्रम: सम्पन्नोऽभूत्। अत: स्वामिवराणां चरणकमले शिरसा वहत्ययं जाह्नवीपरिवार:।

प्रस्तुतस्य सप्तमाङ्कस्य लोकार्पण कार्यक्रम: मधुवनीस्थ रामकृष्ण महाविद्यालय परिसरे निर्धारितो वर्तते, यत्राऽस्माकं सौभाग्यवशात् खण्डवलाकुलकमलदिवाकरेण स्वनामधन्येन प्रथित विपश्चिता डा. श्रुतिधारीसिंह महानुभावेन विविधकार्यक्रम व्यस्तेनापि जाह्नवी-लोकार्पण कृते कृपानुमति: प्रदत्ताऽस्ति।

          प्रतिस्पर्धात्मके युगे साम्प्रतं नैका: संस्कृत पत्रिाका: विभिन्न प्रान्तेभ्य: अन्तर्जाल माध्यमेन संचालिता: सन्ति। यथाप्रख्यातेन संस्कृत विदुषा डा. बलदेवानन्दसागर महाभागेन संस्कृत- पत्राकारितेति ग्रन्थे सविवरणं समुदीरितमस्ति। किन्तु संस्कृत वाङ्मयविचार सारामृतमादाय धीरं प्रवहन्ती सहृदय मनांसि  सिञ्चन्ती संस्कृतमानकपत्रिाकाप्रतिष्ठां ; ISSN सम्प्राप्ता जाह्नवीयं न प्रभावितास्यादिति मन्ये। अस्या: प्रतिष्ठा हेतवे अस्माभिर्यथामतिसप्तमाङ्के प्रभूत: प्रयत्न: कृतोऽस्ति। अन्तर्जालीय पत्रिाकाया: कृते लिपि समस्या प्रमुखतमा आसीत् यत्नपूर्वकं तद्दोष समाधनं कृतमस्मामि: यत्रतत्र टंकण दोष: समापतित: तद्दोष परिहारापायोऽपि साम्प्रतं विहितोऽस्ति अस्या: कृतेपुरा वर्तमान: मानकलेखाभाव: विभिन्नप्रान्तीयै: आलेखान् प्रेषयद्भिः सहृदय विपश्चिद्भिरेव समाहित:। अस्या: पत्रिाकाया: प्राक्तनाङ्केषु आलेख सूची नासीत्, किन्तु प्रस्तुते सप्तमाङ्के साऽपि समावेशिताऽस्ति, यया अस्या: समेषामङ्कानामालेख सूची द्रष्टुं शक्यते। अस्या: जान्हव्या: सर्वत: प्रचाराय प्रसाराय च दूरदर्शनस्य, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तानटाइम्स-सहारा-दैनिक जागरण, नादर्न इण्डिया प्रभृति दैनिक पत्राणामविस्मरणीयं योगदानमस्ति। अतस्तेषां माध्मण्यं स्फुटं व्याहराम:। अस्या: पत्रिाकाया उपयोगिता विषये स्वयं किमपि वक्तुं सर्वथाऽसमर्थ: संस्कृतवाङ्मयरसिका: विद्वांस: पाठका एवात्रा प्रमाणम्। आशास्महे यदनयान्तर्जालीय अन्तर्जाल जाह्नवी पत्रिकया समेषां संस्कृतभाषारसिकानां मनसि महानानन्द: समुदियादिति। अन्ते नानाप्रान्तेभ्य: येषां पण्डितानां महत्त्वाधायिनो लेखा: सम्प्राप्ता: यदीय कृपालवमासाद्य जान्हवीयं समुजृम्भमाणाऽस्ति तेभ्योभूयोभूय: साञ्जलिं धन्यवादान् वितराम:।

श्रुतिध्वनि  मनोहरा   मधुरसा शुभापावनी।

स्मृताऽप्यतनुतापहृत् समवगाह  सौख्यावहा।

निषेव्य   पदपङ्कजा विबुधवृन्द मान्याऽमला

समस्त   जगतीतले   प्रवहतादियं जाह्नवी।।

विद्वदञ्चरणचंचरीकः

      झोपाख्यः सदानन्दः        

लखनौरम्, बिहार


 

प्रकाशकीयम्

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बिपिन कुमार झा

HSS, IIT Mumbai

विद्या समुन्नतिपथं विशदीकरोति,

बुद्धिं विचारविषये प्रखरीकरोति।

कर्तव्यपालनपरां धियमादधाति

विद्या सखा परमबन्धुरयेह लोके॥

(वैदकीय सभाषितम्)

देशस्य सर्वाः भाषाः अस्माकं कृते अत्यन्तसमादरणीयाः वर्तन्ते। एतासां भाषाणां विकासे उत्कर्षे च संस्कृतभाषा सर्वदा पोषिकारुपेण सहाय्यं कृतम्। देशस्य रक्षणे एकसूत्रे बन्धने च महती भूमिका स्थापिता भाषेयम्। परञ्च अधुना सर्वकारैः संस्कृतभाषायाः प्रचाराय प्रसाराय च बहुविधाः कार्यक्रमाः न क्रियन्ते। वैदेशिकभाषायाः विकासाय तैः प्रसाराय च बहुविधः तैः प्रयासः क्रियते। सन्दर्भेऽस्मिन् कविनोक्तम्-

किमहो पण्डिताख्येन विप्रेणापि तिरस्कृता।

देवभाषा त्वया हन्त लाटिनी च पुरस्कृता।।

(4/14 शंकरजीवन-व्याख्यानम्)

स्वसंस्कृतेः रक्षणाय परम्परायाः विकासाय नैतिकोत्थानाय च मौनव्रतं परित्यज्य संस्कृतभाषायाः उत्कर्षाय निश्चप्रचम् आन्दोलनं करणीयम्। तेन न केवलं भाषायाः विकासः भविष्यति अपितु सुसुप्त-स्वाभिमानस्यापि जागरणं भविष्यति।

          भारते संस्कृतभाषायाः प्रचाराय प्रसाराय च बहूनां संस्थानां विश्वविद्यालयानां महाविद्यालयानां च पक्षतः मासिक-पाक्षिक-पत्र-पत्रिकादीनां प्रकाशनं स्वे-स्वे क्षेत्रे दरिदृश्यन्ते एव। परंच गवेषणाविषयिण्यः संस्कृतक्षेत्रानुवर्तिन्यः पत्रिका नितरामङ्गुलिगण्या एव सन्ति। अतो हेतो ’सारस्वत-निकेतनम्’ माध्यमेन अस्माभिः प्रप्रथमतः एतस्याः संस्कृत-ई-पत्रिाकायाः आरम्भः कृतः। अस्याः समुन्नतये स्वीयान् शोध-निबन्धान् सम्प्रेष्योपकुर्युरिति निवेदयामि। जाह्नव्या अङ्कोऽयं संस्कृतवाङ्मयस्य विविधशाखासम्बद्धैः शोधनिबन्धैः सुसज्जितो वर्तते। करुणावरुणालयस्य भगवतः जगन्नाथस्य प्रसादतः संस्कत-ई-पत्रिाका-जाह्नव्याः षड् अङ्कान् लोकाय समर्पितः अङ्कोऽयं सप्तमः भवतां पुरतः वर्तते।

          भाषात्रायस्य त्रिवेणीरूपेण विराजमाना जाह्नव्या अङ्कमिमं सुधीजनानां हस्ते समर्पयन्नहं प्रसन्नप्रकर्षमनुभवामि। अग्रेऽपि भवतां सहयोगं निरन्तरं वयं लप्स्यामह इति विश्वसिमि।

सप्तमे अङकेऽस्मिन् प्रत्यक्षापरोक्षरूपेण येभ्यः सहयोगं प्राप्तवन्तः तेभ्यः सहृदयं ध्न्यवादान् वितरामः।

बिपिन कुमार झा

 

जयतु संस्कृतम्                                                                                   जयतु भारतम्

                                                           

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साहित्यानुरागः

                                                                                                                             

वैदिक जल-चिकित्सा एवं वर्तमान सन्दर्भ

Dr. Umesh Kumar Singh*, Dr. Sudha Singh#

umeshvaidik@gmail.com, sudhavaidik@gmail.com

शोध-सार

प्राचीन काल से भारतवर्ष में जल को पवित्र स्थान दिया गया है तथा समस्त जलस्रोतों की स्तुति की जाती रही है। वर्तमान समय में भी हम देखते हैं कि हमारे समस्त मन्दिरों के पास प्रायः कोई कोई जलस्रोत अवश्य होता है। जितनी भी महत्त्वपूर्ण नदियाँ हैं उनके किनारे पर भी धार्मिक व्यक्तियों द्वारा प्रतिदिन पूजा अर्चना की जाती है। प्रस्तुत पत्र में इस भारतीय परम्परा के महत्त्व को आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है।

                वेद में प्राप्त चिकित्सापद्धतियों में जलचिकित्सा एक महत्वपूर्ण चिकित्सा पद्धति है। शरीर के पाँच महाभूतों में जल का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है, और शरीर में जल का कुल भाग ७० प्रतिशत होता है, अतः शारीरिक स्वास्थ्य में भी जल की अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हिन्दी में भी कहावत है कि - ‘‘सौ रोगों की एक दवा। शुद्ध जल और शुद्ध हवा।’’ जल के प्रदूषण से जहाँ अनेक रोग उत्पन्न होते हैं, वहीं जल के शुद्ध एवं गुणयुक्त होने पर रोगों का नाश भी होता है। जलों के द्वारा चिकित्सा का संकेत तो हमें ऋग्वेद से ही मिलता है, जब हमें बताया जाता है कि जलों में ही समस्त औषधियाँ विद्यमान है।[1]

                अथर्ववेद में आने के बाद हमें जलीय चिकित्सापद्धति कुछ अधिक विकसित रूप में मिलती है। अथर्ववेद में जलचिकित्सा के दर्शन हमें प्रथम काण्ड से ही होने लगते हैं। चतुर्थ सूक्त का चतुर्थ मन्त्र स्पष्ट घोषणा करता है, कि जलों में ही अमृत है और जलों में ही औषधियाँ है, जलों के गुणों से ही अश्व वेगवान् होते हैं और गायें पुष्ट होती है।[2] पञ्चम सूक्त में जहाँ जलों से औषधियाँ प्रदान करने की प्रार्थना की गई है, वहीं छठवें सूक्त में जलों का पञ्चधा विभाजन किया गया है।[3] आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इसका द्विधा विभाजन करके पुनः दशधा विभाजन किया जाता है। तीसरे काण्ड के सप्तम सूक्त में भी जलों को क्षेत्रिय रोगों का नाशक कहा गया है।[4] छठवें काण्ड के तेइसवें एवं चौबीसवें सूक्त में भी हमें जलचिकित्सा का संकेत प्राप्त होता है।

                इस सन्दर्भ में Dr. Massaru Emoto द्वारा जापान में किए गए शोध का उल्लेख करना उचित है जिसमें उन्होंने पाया है कि जलों से प्रार्थना करने पर उनके द्वारा भी प्रत्युत्तर मिलता है। मनुष्य के प्रत्येक विचार, शब्द, चिन्तन, संगीत तथा कार्य का जलों के ऊपर प्रभाव पड़ता है और उनमें सूक्ष्म स्तर पर परिवर्तन जाता है।[5] इन परिवर्तनों के कारण जल का प्रदूषण भी दूर हो जाता है। आगे दिए गए चित्रों में जापान के फूजीवारा बाँध पर प्रार्थना के पहले और प्रार्थना के उपरान्त लिए गए चित्रों से यह प्रदर्शित होता है।

 

जलों के विभिन्न नमूने[6]

http://www.life-enthusiast.com/twilight/emoto/saijo_japan.gif

Sanbu-ichi Yusui Spring water,

http://www.life-enthusiast.com/twilight/emoto/shimanto_river.jpg

Japan Shimanto River, referred to as the last clean stream in Japan