संस्कृत विद्युतपत्रिका



 

 

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शैवदर्शनगत सप्तविध प्रमाता

बिपिन कुमार झा

CISTS, IIT Bombay

9757413505

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            प्रतीपं आत्माभिमुख्येन ज्ञानं प्रकाशः। अहं प्रत्यविमर्शात्मक दर्शन होने के कारण यहाँ आत्मानुभूति अथवा शिवो{हंही प्रधन है। यही प्रमातृनिष्ठता अथवा शिवरूप होना इस दर्शन का वैशिष्ट्य भी है और मूल भित्ति है। अन्य दर्शन जहाँ प्रमाणों के तन्त्राजाल में प्रमाता को आव( करते हैं वही शैव दर्शन स्पष्टतः उसे इन प्रमाणों केा उहापोह से मुक्त कर साध्ना एवं स्वानुभव के प्रशस्त मार्ग पर अग्रसर करता है।

      उपायजालं शिवं प्रकाशयेत् घटेन किं भाति सहस्रदीध्तििः।

     विवेचयन्तित्थमुदारदर्शनः स्वयं प्रकाशः शिवमाविशेतक्षणात्।। तंत्रा, द्वितीय आर्ििंक

    

  यहाँ हमें सत्ता का वर्गीकरण पारमार्थिक एवं सांवृतिक ;बौ(द्ध अथवा पारतार्थिक, प्रातिभासिक एवं व्यावहारिक रूप में प्राप्त नहीं होता। सत्ता निरन्तर अविभाज्य एवं अपने आधर से अभिÂ है। यह समस्त स्तर भेद काल्पनिक है।

            परमशिव के द्वारा शक्तिद्वारा स्वेच्छया के कारण सारा प्रमेय रूप संसार की अभिव्यक्ति होती है। इस प्रमेय का ज्ञान प्रमाता को होता है। तंत्रासार के नवम आर्ििंक में प्रमाता का वर्गीकरण सप्तध किया गया है अभिनवगुप्तपादाचार्य के द्वारा।  जो शिव, मन्त्रामहेश, मन्त्रोश, मन्त्रा, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल के नाम से अभिहित है। ये सातों प्रमाता  शक्तिमान है अर्थात् शक्ति से सम्पÂ है इन्हीं सातों प्रमाताओं ( सप्तध षडधर््शास्त्रा एवं परं परमेशेन उक्तः। तत्रा शिवाः मन्त्रा महेशाः, मन्त्रोशाः, मन्त्रााः, विज्ञानाकलाः, प्रलयाकलाः, सकलाः इति सप्त शक्तिमन्तः। तं. सा. नवम . पृ. 51) के आधर पर ध्रातत्व से प्रधन तत्व तक की विवेचना की गई है। जैसा के पूर्व भी चर्चित हुई है प्रमाता में शक्ति का उद्रेक किसी विशेष कारण से होकर स्वेच्छया होता है।

            यहाँ प्रश्न है कि ये प्रमाता सप्तविध् ही क्यों है। इसका समाधन इस प्रकार किया जा सकता है कि चुँकि शक्तियाँ सात प्रकार  की होती है। इसीलिए प्रमाता सात प्रकार (तंत्राा. 1/1/78) के कहे गए हैं। ध्यातव्य है कि सात प्रकार कहने का आशय खण्डशः विभाजन नहीं है। मूलतः तो प्रमाता एक अखण्डरूप परमशिव ही है स्वेच्छया शक्ति उद्रेक के कारण यह सात प्रकार की है। प्रमाताप्रवर्ग में जब शक्तिमान रूप की प्रधनता होती है तो उसमें शक्तिमान स्वरूप शिवरूप ही विश्रान्त होता है (......... तदपि सप्तविध्ं प्रमातृणां शिवात् प्रभृति सकलान्तानां तावत् उक्तत्वात्। तंत्रा सा. पृ. 52  )  प्रमाता में भेद शक्ति भेद के कारण है। प्रमाता प्रमेय प्रमा और प्रमाण को स्वरूपापत्ति का मूलशक्ति ही है।

            प्रमाता भेद में प्रथमतया सकल जड़ पदार्थ हमें दृष्टिगत होता है (    तत्रा सकल विद्याकले शक्तिः ............. अस्पुुफटे। वही पृ. 53)  विद्या तथा कला सकलपुरुष की शक्ति के रूप में ही तंत्राालोक के अनुसार विद्या इसके कर्म का विवेचन करती है। कला से युक्त होने के कारण ही वह सकल के रूप में अभिहित है। विद्या के कारण ही इसमें अल्पज्ञत्व होता है यह ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों के द्वारा प्राप्त वैशिष्ट्य द्वारा आच्छादित होता है सकल प्रमाता स्तर पर प्रत्येक वस्तु का पृथकशः भिÂता का अवबोध् होता है। इस स्तर पर पूर्णतः आत्माच्छादन हो जाता है। इस स्तर पर आणव, कार्म तथा मायीय तीनों मल विद्यमान होते हैं। इसी स्तर पर नियति, राग, काल की प्रमुखता होती है। नियति के कारण ही देश और कारण का बन्ध्ज होता है वही काल के काल अनित्यत्व आता है।

            जब विद्या तथा कला की जब अस्पुफटता होने लगती है  तो विषयों की सम्पर्क शून्यता की स्थिति सी आने लगती ही है। ऐसी स्थिति में प्रमाता शून्यप्रमाता कहा जाता है यह प्रलयाकल की स्थिति है इस स्तर पर विद्या ासमती होती है इसके साथ ही कला ासमती होती है। इस स्तर पर अज्ञान जिसका कारण मल होता है इसके अज्ञान के कारण संसारवृक्ष का अंकुरण होता है। इस दशा में आणव तथा मायीय मल होता है।

            जिस अवस्था में इन दोनों ;विद्या एवं कलाद्ध का विगलन प्रारंभ होता है वह अवस्था विज्ञानाकल के रूप में जाना जाता है। इस स्तर पर विद्या तथा कला में क्षीणता आने लगती है।  इस स्थिति में यही विगलकल्पशक्तियाँ होती है। यहाँ बोध् तो विद्यमान होता है किन्तु कर्तृत्व का अभाव होता है जिस कारण विरक्ति का उदय होता है।

            उक्त प्रमाता के तीन स्तर अशु( (्वा के अन्तर्ग परिगणित है इन तीन स्तरों पर पतन की संभावना अध्कि रहती है इन्हीं स्तरों पर संस्कारों का जागरण होता है।

            जब विज्ञानाकल स्तर के अनन्तर प्रमाता शु( विद्या द्वारा परिष्कृत होता है तब वह मंत्रा पुरुष के नाम से शु( विद्या संस्कारों को परिष्कृत करने का कार्य करती है। मंत्रा पुरुष की स्थिति में शु(ाविद्या प्रबु(मती हो जाती है। यहाँ पर अहं इदं की भिÂता होने लगती है किन्तु पूर्णतः पृथकता नहीं होती है। यहाँ पर इदमिदं अहमहं का भाव रहता है प्रत्येक वस्तु के भेद ज्ञान पर आत्मा से संब( ज्ञान होता है।

            मन्त्रा पुरुष के स्पुफट होने की स्थिति में प्रमाता का जो स्तर सामने आता है वह मन्त्रोश्वर के नाम से जाना जाता है। इस अवस्था में इदमहम का बोध् रहता है। यहाँ शु( विद्या इच्छा रूप में स्पुफट रहती है। अर्थात् इस अवस्था में इच्छा रूपता धरण करने वाली शक्ति रहती है।

            जब मन्त्रोश्वर स्वातंत्रय रूप इच्छा शक्ति रूप और स्वभाव ग्रहण करने की प्रवृत्ति से समन्वित हो जाता है तब वह मन्त्रामहेश प्रमाता के रूप में होता है। यहाँ पर अहमिदंका भाव रहता है।

            इसके अनन्तर जब उत्कर्ष की ओर उन्मुख हुई शु( विद्या पूर्णतः स्पुफट हो जाती है और यह स्थिति शिव प्रमाता रूप में होता है। इस सर्वोच्च स्तर पर सर्वप्रकाशमयत्व रहता है। इसके साथ ही इस प्रमाता में नित्यतृप्तता रहती है, पूर्णत्व रहती है सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, नित्यत्व तथा व्यापक स्वातंत्रययुक्त यह स्तर ही परम शिव की शक्ति है।

            इस प्रकार सकल, प्रलयाकल, विज्ञानकल, मन्त्रा, मन्त्रोश्वर, मन्त्रामहेश्वर और शिव ये सात प्रमाता (........ इति शक्ति भेदाः सप्त मुख्याः। वही पृ. 53) के स्तर है इनकी क्रमशः विद्याकला, निर्विषया, विगलत्कला, शु(विद्या, प्रबु(, इच्छारूपता तथा स्वातंत्रयात्मिका शक्ति है। विवेचित क्रम में उफध्र्वगमन उत्कर्ष तथा अधेगमन अध्ःपतन का परिचायक है।

            इसप्रकार हम देखते हैं कि सकल प्रमाता के स्तर पर जहाँ व्यावहारिक जगत की व्याख्या हो जाती है वही शिव के स्तर पर पारमार्थिक जगत की व्याख्या हो जाती है।

            काश्मीर शैवदर्शन की यह विशेषता है कि बिना किसी अन्य ;यथामायाद्ध की सहायता लिए व्यावहारिक जगत की भी समुचित व्याख्या प्रस्तुत करता है।

 

 

 

सन्दर्भग्रन्थ सूची

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.............., तन्त्राालोक, ;संपा.द्ध नवजीवन रस्तोगी, वाराणसी, मोतीलाल बनारसीदास, 1987

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