संस्कृत विद्युतपत्रिका



 

 

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आचार्य वटेश्वर के अनुसार ज्यापिण्ड विवेचन

राहुल मिश्र

शोध छात्र  - ज्योतिष विभाग,

सं.वि.ध.वि. सज्रय, का.हि.वि.वि., वाराणसी

      कक्षावृत्तस्थ स्पष्ट ग्रह मध्यमगति से प्रतिवृत्त में भ्रमण करते हैं, किन्तु स्पुâटगति से प्रतिवृत्त में भ्रमण करते हुए ग्रह कक्षावृत्त में देखे जाते हैं। अत: प्रतिवृत्त स्थित ग्रह कक्षावृत्त में दृकतुल्य हो उसके लिए आचार्य ने ‘‘अर्धज्या रसबाण: करशशिशशिनो गजाङ्गचन्द्रमस:’’  इत्यादि के द्वारा ९६ ज्यापिण्डाओं का वर्णन किया हैं। परन्तु सूर्यसिद्धान्तकार, ब्रह्मगुप्त आदि आचार्यों ने पदमध्य में २२५’ कलान्तरित पर चौबीस ज्याओं के मान साधन कर पठित किये हैं। आचार्य वटेश्वर छियानवे कलात्मकज्या विकला सहित पठित किए हैं।

आचार्य ९६ ज्याओं का साधन ‘‘क्रमोत्क्रमज्या कृति योगमूलाद्दलं तदर्धांशकशिञ्जिनी स्यात्’’ इससे अथवा ‘‘त्रिज्योत्क्रमज्या निहतेर्दलस्य मूलं तदर्धांशक शिञ्जिनी वा’’, तथा ‘‘त्रिज्यार्धं राशिज्या’ इत्यादि प्रकार से करते हैं। प्राचीन आचार्य भी सभी ज्याओं के मान इन्हीं रीतियों से साधित किये हैं। नवीन मत से भी उनके ज्ञान सुलभ ही से हो जाते हैं। २२५’ कलान्तरित चौबीस ज्याओं के साधन में ‘‘जीवा स्वसप्तारियुगांशहीना द्विघ्नी च पूर्वज्यकया विहीना’’ इत्यादि प्रकार का अथवा ‘‘त्र्यब्धिघ्न मौव्र्या अयुतेन लब्धं द्विघ्नज्यकाया: प्रविशोध्य शेषम्’’ इत्यादि प्रकार का आश्रयण करना चाहिए। वहाँ त्रिज्या • ३४३८ है। ९६ संख्यक जीवाओं के ज्ञान के लिए प्रथमोत्क्रमज्या एतदाधारक (९६ संख्यक ज्याधारक) लेकर अग्रज्या और पृष्ठज्या के योग ज्ञात कर उसमें पृष्ठज्या को घटाकर अग्रज्या ज्ञात करना अथवा अग्रज्या और पृष्ठज्या घात संशोधक प्रकार से ज्ञात कर उसमें पृष्ठज्या से भाग देने से अग्रज्या प्राप्त हो जायेगा। इस प्रकार सभी ज्याओं का ज्ञान हो जायेगा। पठित ९६ ज्याओं के स्वरूप देखने से मालूम होता है कि पदादि से ज्यों-ज्यों चाप गति बढ़ती है त्यों-त्यों ज्यागति अल्प होती हैं। इसको क्षेत्र द्वारा स्पष्ट करते है–

 

 

पच चाप • चफ चाप,

द्विगुणित पच चाप की पूर्णज्या • पफ रेखा,

पफब जात्य त्रिभुज में पफ कर्णार्ध बिन्दु • ल,

तब भर • रब • नस,

नस • फर एतत्सम्बन्धी चापों में

पन   नफ अर्थात् २ नप   पफ चाप,

२ नस • फब अत: तुल्य चाप वृद्धि में तुल्य ज्यावृद्धि नहीं होती है यह सिद्ध हुआ।

तथा फर • रव,   फय   यव • चष,   फय   चष परन्तु पच • फच इसलिए सिद्ध हुआ कि चापवृद्धि से ज्यावृद्धि अल्प होती है।

पठित ज्याओं में इष्टज्या से पूर्व और पर (पृष्ठज्या, अग्रया) जीवाओं के गुणनफल का साधन सिद्धान्तशिरोमणि की टिप्पणी में किया गया हैं। जैसे कल्पना करते हैं इष्टचाप • इ। प्रथमचाप • प्र। तब पृष्ठज्या • ज्या (इ – प्र), अग्रज्या • ज्या (इ ± प्र) दोनों के घात करने से पृष्ठज्या ² अग्रज्या • ज्या (इ – प्र) ² ज्या (इ ± प्र) चापयोरिष्टयोर्दोज्र्ये इत्यादि से   ²   • अग्रज्या ² पृष्ठज्या योगान्तर घात वर्गान्तर के बराबर होता है इस नियम से    • •       ज्या२इ – ज्या२प्र. अग्रज्या ² पृष्ठज्या ‘‘तत्त्वादस्तानगांशोना एवमत्राद्यशिञ्जिनी’’ इससे २२५-  • प्रथमज्या।

प्रथमज्या वर्ग • ५०५६०

  ज्या२इ – ज्या२प्र • ज्या२इ – ५०५६० • अग्रज्या ² पृष्ठज्या

इससे ‘‘ज्यावर्गात्खरसाक्षाभ्र बाणोनात्पूर्वजीवया, अवाप्तमग्रजीवास्यादग्रातं पूर्वशिञ्जिनी। एवमासन्नजवाभ्यां गजाग्न्यब्धिगुर्णर्मिते। व्यासार्धेऽत्र वशिष्टज्या सिद्ध्यन्ति लघुकर्मणा’’ संशोधकोक्त उपपन्न होता है। वटेश्वर के मत से प्रथम ज्यामान • ५६’/१५’’ इसके वश से अग्रज्या पृष्ठज्या के घात जानना चाहिये। उस घात में पृष्ठज्या से भाग देने से अग्रज्या होती है और अग्रज्या से भाग देने पर पृष्ठज्या होती है। इसकी उपपत्ति क्षेत्र युक्ति से भी होती है। यथा-

यहाँ यदि इष्ट चाप • प्रथम चाप तब ज्या (इ – प्र) • पृष्ठज्या • ०, और ज्या (इ ± प्र) • ज्या २प्र • अग्रज्या परन्तु अग्रज्या ² पृष्ठज्या • ज्या२इ – ज्या२प्र • ० • अग्रज्या ² ० इसलिये अग्रज्या • ० इसका मान कुछ नहीं है परन्तु यहाँ अग्रज्या मान है अत: संशोधकोक्त प्रकार समीचीन नहीं है। परन्तु विशेष रूप से पं. सुधाकर द्विवेदी जी खण्डन करते हुए कहते है कि ‘‘पूर्वाज्या यत्र शून्या प्रथमगुणमितिश्चज्ज्यका तर्हि विद्वन्’’ इत्यादि के द्वारा अग्रज्या ² पृष्ठज्या ज्या२इ – ज्या२इ यदि पृष्ठज्या • ० तब अग्रज्या ² ० • ज्या२इ – ज्या२प्र परन्तु वर्गान्तर योगान्तर घात के बराबर होता है।   अग्रज्या ² ० • (ज्याइ ± ज्याप्र) (ज्याइ – ज्याप्र) परन्तु ज्याइ – ज्याप्र • ० अत: अग्रज्या ² ० • (ज्याइ ± ज्याप्र) ² ०, इसलिए   • अग्रज्या • ज्याइ ± ज्याप्र अत: लुप्तभिन्न समीकरण से संशोधकोक्त प्रकार से यहाँ अग्रज्या का मान उचित ही आया। इसलिए यह प्रकार समीचीन ही है, इसमें कुछ भी दोष नहीं है।

यहाँ पर ‘‘जीवा स्वसप्तारि युगांशहीना द्विघ्नी च पूर्वज्यकया विहीना। स्यादग्रजवा बृहतीति सर्वा आसन्नजीवाद्वयतो भवन्ति।।’’ इत्यादि से विशेष अग्रज्या और पृष्ठज्या के योगानयन किये हैं। जैसे- कल्पना करते हैं इष्टचाप • इ। प्रथम चाप • प्र। अग्रज्या • ज्या (इ ± प्र), पृष्ठज्या • ज्या (इ – प्र) तब अग्रज्या ± पृष्ठज्या • ज्या (इ ± प्र) ± ज्या (इ – प्र) चापयोरिष्टयोरित्यादि से अग्रज्या ± पृष्ठज्या •   ±         • २ ज्याइ   • २ ज्याइ -  • २ ज्याइ -   • अग्रज्या ± पृष्ठज्या।

‘‘त्र्यब्धिघ्न मौव्र्या अयुतेन लब्धं द्विघ्नज्यकाया: प्रविशोध्य शेषम्। विश्लिष्य पूर्वज्यकयाऽग्रजीवा वेद्याग्रमौव्र्या खलु पूर्वजीवा।।’’ के अनुसार

अग्रज्या ± पृष्ठज्या • २ ज्याइ -   यहाँ द्वितीय खण्ड में हर भाज्य को १०००० से गुणने से २ ज्याइ -   • २ ज्याइ -   • २ ज्याइ -  , प्रमाण प्राप्त होता है।

वटेश्वराचार्य ने ‘‘शक्रा: सदलेन्दुगणा दृगगा द्विभुजा: सुरा: शिवा: स्पष्टा:’’  इत्यादि से सूर्य के मन्दपरिध्यंश • १४, चन्द्र के मन्दपरिध्यंश • ३१/३०, मंगल के मन्दपरिध्यंश • ७२, बुध के मन्दपरिध्यंश • २२, वृहस्पति के मन्दपरिध्यंश • ३३, शुक्र के मन्दपरिध्यंश • ११, शनि के मन्दपरिध्यंश • ४६, बताया है। परन्तु सूर्यसिद्धान्तकार ने ‘‘रवेर्मन्दपरिध्यंशा मनव: शीतगोरदा:’’  इत्यादि के अनुसार समपदान्त में रविमन्दपरिध्यंश • १४, चन्द्र के मन्दपरिध्यंश • ३२, विषमपदान्त में बीस कला घटकर रविमन्दपरिध्यंश • १३/४०, चन्द्र मन्दपरिध्यंश • ३१/४०, भौमादिग्रहों के समपदान्त में क्रमश: मन्दपरिध्यंश ५७, ३०, ३३, १२, २९ तथा विषमपदान्त में क्रमश: ७२, २८, ३२, ११, ४८ कहा है। ब्रह्मगुप्त ने भी ‘‘सूर्यस्य मनु द्वितयं त्र्यंशोनं दिनदेन तस्य प्राक्’’  इत्यादि के अनुसार सूर्य और चन्द्र के मन्दपरिध्यंश भिन्न ही कहते है। यथा-

मन्दपरिधि    ऋणफल में   धनफल में

पूर्व उन्मण्डल में रवि के रहने से मन्दपरिध्यंश    १४/०  १३/२०

मध्याह्न में रवि के रहने से मन्दपरिध्यंश  १३/४० १३/४०

पश्चिम उन्मण्डल में रवि के रहने से मन्दपरिध्यंश १३/२० ४०/०

पूर्व उन्मण्डल में चन्द्र के रहने से मन्दपरिध्यंश   ३०/४४ ३०/४४

मध्याह्न में चन्द्र के रहने से मन्दपरिध्यंश ३१/३६ ३१/३६

पश्चिम उन्मण्डल में चन्द्र के रहने से मन्दपरिध्यंश      ३२/२८ ३०/४४

      कुज का मन्दपरिध्यंश • ७०, बुध मन्दपरिध्यंश • ३८, गुरु मन्दपरिध्यंश • ३३, समपदान्त में शुक्र मन्दपरिध्यंश • ११ तथा विषमपदान्त में शुक्र मन्दपरिध्यंश • ९, शनि मन्दपरिध्यंश • ३०। भास्कराचार्य भी एतदनुसार ही कहते है केवल शनि के मन्दपरिधि में अन्तर है। इससे मालूम होता हैं कि मन्दान्त्यफलज्या बराबर एक रूप नहीं रहती है जिसके कारण मन्दनीचोच्च वृत्तपरिधि के विषय में भी आचार्यों में मतभेद है।

      मन्दपरिधि के उपरान्त आचार्य ने भौमादि ग्रहों के शीघ्रपरिधि के विषय में ‘‘त्रिगुणयमा वसुविश्वे शरत्र्तव: खोत्कृती तथाक्षिगुणा:’’  इत्यादि के द्वारा मङ्गल का २३३, बुध का १३८, वृहस्पति का ६५, शुक्र का २६० तथा शनि का ३२ शीघ्रपरिध्यंश बताया है। परन्तु इससे भिन्न भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्त में ‘‘एषां चल: कृतजिनास्त्रिलवेन हीना दन्तेन्दवो वसुरसा बसुबाणदस्रा:’’  इत्यादि के द्वारा कुज परिधि • २४३/४, बुध शीघ्रोच्चपरिधि • १३२, गुरु शीघ्रपरिधि • ६८, शुक्र शीघ्रोच्च परिधि • २५८, शनि शीघ्रपरिधि • ४० निर्देशित किया है।

      आचार्य ने ‘‘मन्दतुङ्गरहितो नभश्चरो मन्दकेन्द्रमथ खेचरोनितम्’’  इत्यादि से केन्द्र कहते हैं तथा उससे भुजज्या और कोटिज्यादि की कल्पना करते है। देशान्तर भुजान्तर बीजकर्म संस्कृत मध्यमग्रह में, भौमादि मन्द स्पष्ट ग्रह में मन्दोच्च घटाने से मन्दकेन्द्र होता है। शीघ्रोच्च में मन्द स्पष्टग्रह को घटाने से शीघ्रकेन्द्र होता है, तीन-तीन केन्द्रराशियों के एक-एक पद होते हैं। विषम पद में गत चाप की ज्या और गम्य चाप की कोटिज्या भुजाग्र संज्ञक प्रथम और द्वितीय भुजाग्र संज्ञक हैं। समपद में गम्य चाप की ज्या और गत चाप की कोटिज्या भुजाग्र संज्ञक है। भुजाग्रांशोत्क्रमज्या को त्रिज्या में घटाने से भिन्न भुजाग्र संज्ञक होता है। यहाँ क्षेत्र द्वारा स्पष्ट करते है-

न • वृतकेन्द्र।

मच • इष्टचाप।

चस • इष्टचापकोटि।

चर • इष्टचापज्या • भुजाग्रसंज्ञक।

रम • इष्टचाप की उत्क्रमज्या • भुजाग्रभागोत्क्रमज्या।

सप • इष्टचाप कोटि की उत्क्रमज्या • द्वितीय भुजाग्र भाग की उत्क्रमज्या।

नम • त्रिज्या। नस • त्रिज्या। नम – रम • त्रिज्या – भुजाग्रभागोत्क्रमज्या • रन • चप • द्वितीय भुजाग्र संज्ञक • कोटिज्या। तथा नस – सप • नप • त्रिज्या – द्वितीयभुजाग्रभागोत्क्रमज्या • त्रिज्या – कोट्युत्क्रमज्या • भुजाग्रसंज्ञक • चर • भुजज्या।

अन्य क्रम में आचार्य क्रमश: क्रमज्या साधन, व्यास साधन, दो प्रकार से ज्या साधन तथा दो प्रकार से चाप साधन करते हैं जो सूत्र रूत्र में निम्न प्रकार से हैं-

१. क्रमज्या साधन सूत्र   

२. व्यास साधन सूत्र   

३. प्रथम प्रकार से ज्या साधन सूत्र   

४. द्वितीय प्रकार से ज्या साधन सूत्र   

५. प्रथम प्रकार से ज्या से चाप साधन सूत्र   

६. द्वितीय प्रकार से ज्या से चाप साधन सूत्र   

      परन्तु उपर्युक्त साधनों में सूक्ष्मता नहीं है, क्योंकि साधन के क्रम में गृहीत त्रिभुज सजातीय नहीं है।

 

 

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